कहाँ से आ रुकती लबों पे यह बात
होती न आज दिन-ए-मोहलत की यह रात
खौफ़ के खौफ़ से जो रिश्ता ही थम गया
लौट आया वो लेकर बर्कत की यह रात
होती न आज दिन-ए-मोहलत की यह रात
इस साये की भी होगी कहानी कोई
परछाईं न उठाती ज़हमत की यह रात
होती न आज दिन-ए-मोहलत की यह रात
आलम की सफ़ाई में कर्वटें लेकर
जो, चलती ही जाए चित्त-पट्ट की यह रात
होती न आज दिन-ए-मोहलत की यह रात
2 comments:
waqt bhi aaa gaya ab jo lahu lipti dharkkan pe chaa gaya ab toh waqt aage nikal gaya ab fir milenge paapi nadiyan kinare :)
:)
yeh rahi nadiya. yeh rahe paapi. mil liye?
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