रहम को पनाह न देंगे अब,
कि ज़लीलों में बस जाएँ;

आग वो दूसरी कहती है,
कहीं फिर न तरस जाएँ.


Raham ko panah na denge ab,
ki zaleelon me bas jaayen;

Aag vo doosri kehti hai,
kahin phir na taras jaayen.

मेरे यार

यार मेरे, इन सियाह शामों
की ढेर लगा दें तो कितनी ऊँची होगी?
इतनी, कि सारे बिखरे रिश्तों से ऊँची?

यार मेरे, इन सियाह शामों
के दाग लग चुके हैं,
तुम्हारे लम्बे से लम्बे हाथों की
उलझी हुई लकीरों पे,
और इस चादर पे.

एक ऐसी शाम आए,
जब ये सियाही दस्तक देके
तुम्हारे अधखुले दरवाज़े को
पार कर, चौखट से मुकर जाए,
तो इन दागों को देखकर खुश हो ना तुम.

और जिस फुर्ती से ये भी
उतर उतर के एक कोने में
इकट्‍ठा होती जाएँगी,
उस तेज़ी से घबराना नहीं -
यही सोचके खुश होना
कि शाम की फ़ितरत ही
डामाडोल है.

मोहलत

कहाँ से आ रुकती लबों पे यह बात
होती न आज दिन-ए-मोहलत की यह रात

खौफ़ के खौफ़ से जो रिश्ता ही थम गया
लौट आया वो लेकर बर्कत की यह रात
होती न आज दिन-ए-मोहलत की यह रात

इस साये की भी होगी कहानी कोई
परछाईं न उठाती ज़हमत की यह रात
होती न आज दिन-ए-मोहलत की यह रात

आलम की सफ़ाई में कर्वटें लेकर
जो, चलती ही जाए चित्त-पट्ट की यह रात
होती न आज दिन-ए-मोहलत की यह रात

हल्दी

आज मेरे हाथ से हल्दी की डिब्बी छूट गई,
देखो, शायद मेरे हाथ पीले हो गए.
कहाँ कल तक आप मुझसे पूछा करती थीं
कि खाने में क्या बनाऊँ.
अखाड़े में काई जम गई है, अम्मा,
अब वैसी धूल ही कहाँ, जो हमारे घर में
सिंकते बैंगन से उड़ती चिंगारियों की तरह
उड़ा करती थी.
यह रसोई पता नहीं किसकी है.
आँगन से कुछ बच्चे न जाने क्यों मुझे उसी नज़र से देखते हैं
जिसमें मैंने शायद आपको बहुत साल क़ैद रखा.
इस बड़े से घर में मैं भूखी हूँ;
कहाँ घर के हर कोने में बहस की वजह छुपा करती थी.

For Home

For you have been at the back of my mind,

and the front of my mind,

for years,

and for you the city is no more home

than it is for me,

for we both wandered there,

or away from there,

for reasons sometimes sentimental.

For going home is a process,

for peace of mind and a piece of memory to check on,

once in a while.

For you complete me,

you with your way of changing,

ever so often.

For you are home.